करवा चौथ व्रत, जानिए पूजा विधि और नियम

सनातन धर्म मे करवा चौथ का व्रत सुहागन स्त्रियों के लिए सबसे खास त्योहार है। सुहागन स्त्रियां इस दिन का पूरे साल इंतजार करती हैं। ऐसी मान्यता है कि जो सुहागन स्त्री करवा चौथ का निर्जला व्रत करती हैं और व्रत पूर्ण होने पर चौथ के चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं उनके पति की लंबी उम्र होती है। इस साल करवा चौथ 4 नवंबर, बुधवार को मनाया जा रहा है।

हिंदू पंचांग के मुताबिक हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन सुहागन स्त्रियां अपने पति के मंगल कामना के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं। भारत देश में वैसे तो चौथ माता जी के कही मंदिर स्थित है, लेकिन सबसे प्राचीन एवं सबसे अधिक ख्याति प्राप्त मंदिर राजस्थान राज्य के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा गाँव में स्थित है। चौथ माता के नाम पर इस गाँव का नाम बरवाड़ा से चौथ का बरवाड़ा पड़ गया। चौथ माता मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने की थी। यह पर्व मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब दिल्ली और पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो स्त्रियां इस दिन व्रत करती हैं और सच्चे मन से माता पार्वती से अपने पति के मंगल की कामना करती हैं उन्हें माता पार्वती से सदा सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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पौराणिक कथाओं में भी करवा चौथ की महिमा का बखान किया गया है। करवा चौथ का व्रत इतना अधिक प्रभावशाली हैं कि यह पतिव्रता स्त्रियों के पतियों के प्राणों की रक्षा कर सकता है। साथ ही यह भी माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से पति का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है।

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करवा चौथ पूजा शुभ मुहूर्त

पूजा का शुभ मुहूर्त – 4 नवंबर, बुधवार – शाम 5 बजकर 34 मिनट से 6 बजकर 52 मिनट तक।

उपासना का समय – 4 नवंबर, बुधवार – सुबह 6 बजकर 35 मिनट से रात 8 बजकर 12 मिनट तक।

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करवा चौथ से जुड़े नियम

1.) करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से चंद्र उदय तक रखा जाता है। यदि आपके यहां पर सरगी खाने का रिवाज है तो आप सूर्योदय से पहले सरगी खा लें। करवा चौथ के दिन महिलाओं को पीले या लाल रंग के वस्त्र ही धारण करने चाहिए। इस दिन काले और सफेद रंग के वस्त्र धारण करना निषेध माना जाता है।

2.) करवा चौथ व्रत की कथा सुनते समय साबूत अनाज और मीठा साथ में अवश्य रखें। इस दिन कहानी सुनने के बाद बहुओं को अपनी सास को बायना देना चाह‍िए। इसमें खाने पीने की वस्तुएं, वस्त्र और श्रृंगार का समान रखना चाह‍िए। करवा चौथ की पूजा में मिट्टी का करवा विशेष माना जाता है। इसलिए इस दिन मिट्टी के करवे से ही करवा चौथ की पूजा करें।

3.) संध्या के समय चंद्रोदय से लगभग एक घंटा पूर्व शिव-परिवार (शिवजी, पार्वतीजी, गणेशजी और कार्तिकेयजी सहित नंदीजी) की पूजा की जाती है। इसके अवला चंद्रदेव की पूजा करना भी जरूरी है। पूजन के समय देव-प्रतिमा का मुख पश्चिम की ओर होना चाहिए तथा महिला को पूर्व की ओर मुख करके बैठना चाहिए। इस व्रत के दौरान महिलाओं को लाल या पीले वस्त्र ही पहनना चाहिए। इस दिन पूर्ण श्रृंगार और अच्छा भोजन करना चाहिए।

4.) करवा चौथ व्रत के दिन सिलाई-कढ़ाई नहीं करनी चाहिए। साथ ही यह भी मान्यता है कि इस दिन व्रती स्त्री को सब्जी नहीं काटने चाहिए और ना ही कटे हुए फल, सब्जी या दाल का सेवन करना चाहिए। इस व्रत में धारदार वस्तुओं का प्रयोग करना मना होता है। इन वस्तुओं में चाकू, कैंची, सूई, तलवार और चौपर शामिल हैं। इनका प्रयोग करने से पति का अमंगल हो सकता है। इसलिए प्रयास करें कि आप यह कार्य ना करें।

5.) चंद्रमा का उदय होने के बाद सबसे पहले महिलाएं छलनी में से चंद्रमा को देखती हैं फिर अपने पति को, इसके बाद पति अपनी पत्नियों को लोटे में से जल पिलाकर उनका व्रत पूरा करवाते हैं। कुआंरी महिलाएं चंद्र की जगह तारों को देखती हैं। जब चंद्रदेव निकल आएं तो उन्हें देखने के बाद अर्घ्य दें।

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